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समाचार पत्रों से

चिराग तले अंधेरा

सोनभद्र में होता है तीन हजार मेगावाट से अधिक बिजली का उत्पादन लेकिन यहां के लोगों को ही बिजली नहीं मिलती। यहां के 273 गाँ के लोगों ने अपने घरों में आज तक बिजली देखी ही नहीं

 

लखनऊ से योगेश मिश्र

अब उन्हें अंधेरा सालने लगा है। उनकी समझ में यह आ गया है कि बिना सड़कों पर उतरे सरकार सुनने वाली नहीं है। यही वजह है कि कल तक अपने लिए अपनी सरजर्मी पर उत्पादित बिजली का एक छोटा सा हिस्सा माँग रहे लोग अब तीन-कमान लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। उनकी ही सरजर्मी पर तीन हजार बाहर मेगावाट बिजली तकरीबन आजादी के बाद से पैदा हो रही है लेकिन हद तो यह है कि उन्हें खुद जरूरत भर बिजली भी उपलब्ध नहीं है। वे पिछले 62 सालों से अंधेरे में रहने को अभिशाप है। देश भर के लिए बिजली पैदा करने वाले सोनभद्र जिले में कुल 501 राजस्व गाँव है। अगर टोले और पुरवा के लिहाज से इनकी संख्या गेनी जाए तो वह 1144 बैठती है। यहां पर बसने वाली पूरी आबादी के लिए अगर 24 घंटे बिजली दी जाए तो केवल नब्बे लाख यूनित बिजली की ही जरूरत पड़ेगी। परन्तु यहां के लोगों को इतनी बिजली भी मयस्सर नहीं है बिजली महकमें के आंकड़े चुगली करते हैं कि परे सोनभद्र जनपद को महज तीस लाख यूनिट बिजली मिलती है जो वहां की जरूरत का एक तिहाई मात्र है। बावजूद इसके राज्य सरकार जिला मुख्यालय पर 14 घंटा और गांवों में 10 घंटे बिजली देने का दावा करते हुए अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन हकीकत की पड़ताल की जाए तो जितनी बिजली सोनभद्र को समस्सर होती है उससे राज्य सरकार के दावों का पूरा होना एक झूठ को ही कई बार बोलकर सच साबित करने जैसा है। जमीनी हकीकत यह है कि गांवों में 6-8 घंटे और जिला मुख्यालय पर 10 घंटे से अधिक बिजली मयस्सर ही नहीं है।

सरकारी दावों की कलई जिले के विद्युतीकरण से भी खुलती है सरकारी फाइलों मेंसोनभद्र के सभी गांवों को विद्युतीकरण से संतृप्त कर दिया गया है पर हकीकत कुछ और ही बयान करती है। सोनभद्र केराजस्व गांव तक बिजली पहुंचाई गई है लेकिन टोले, मजरे और पुरवा अभी बिजली के तार खिंचने की बाट जोह रहे हैं। गौरतलब है कि राजस्व गांव से तकरीबन तीन गुना टोले, मजरे और पुरवों की संख्या है। इतना ही नहीं, सोनभद्र के अस्सी फीसदी अंबेडकर गांवों में विद्युतीकरण के तहत तार भले बिछ गए हों, खंभे खड़े कर दिए गए हों लेकिन उनमें बिजली अभी तक नहीं दौड़ी है। यही नहीं राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत काफी काम करके जिला प्रशासन अपनी पीठ थपथपा रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि नक्सल प्रभावित 273 टोले, मजरे और गांवों के लोगों ने अभी तक बिजली का प्रकाश अपनी झोपड़ी में देखा तक नहीं हैं। इनमें म्योरपुरा और जोगिन्दरा आदि बड़े गांव भी आते हैं। यही नहीं, बिजली नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) के ऊर्जा संयत्रों के आसपास के भी गांवों से बेहद दूर है। रिहन्द ऊर्जा संयंत्र के 20-25 किलोमीटर के क्षेत्र वाले ब्लाक म्योरपुर और बीजपुर के तमाम गांवों के वाशिंदे अभी तक  बिजली के सुख से वंचित है। इतना ही नहीं, इस ब्लाक के जरहा और चेतवा गांवों में एनटीपीसी ने बिजली न पहुंचा पाने की भरपाई के लिए पूरे गांव को सौर्य ऊर्जा से प्रकाश देने का अभियान चलाया है। सहकारिता के मार्फत चल रहे इस अभियान के यहां के लोग बिजली भले पा गए पर उनको यह दुख सता रहा है कि उन्हीं की सरजमी पर पैदा होने वाली बिजली पर उनका हक और हुकूक क्यों नहीं है? वह भी तब जब किसी भी ऊर्जा संयंत्र कोलगाने की एक अनिवार्य शर्त यह होती है कि इस संयंत्र से बनने वाली बिजली से आसपास के गांव जरूर रोशन होगें।

गौरतलब है कि सोनभद्र में राज्य ओर केन्द्र दोनों सरकारों के ऊर्जा संयंत्र है। केन्द्र की दो हजार मेगावाट कीएनटीपीसी रिहन्द, दो हजार मेगावाट की सिंगरौली के साथ ही ठीक बगल के इलाके जो मध्य प्रदेश में हैं, उसमें 3260 मेगावाट की विंध्याचल परियोजना है। जबकि राज्य सरकार के अनपरा ऊर्जा संयंत्र में 230 मेगावाट की दो यूनिटें भी लगी हैं। इस तरह यहां 1630 मेगावाट के उत्पादन के एवज में 1200-1300 मेगावाट के आसपास बिजली बनती है जबकि ओबरा ऊर्जा संयंत्र में 50-50 मेगावाट केदो, 94 मेगावाट के तीन ओर 200 मेगावाट की पांच यूनिंटे लगाई गई है लेकिन 1382 मेगावाट के इन बिजली संयंत्रों से महज पांच-छह सौ मेगावाट बिजली ही तैयार हो पाती है। इसके अलावा जल विद्युत निगम की ओर से पिपरी में 50-50 मेगावाट की छह यूनिटें और ओबरा में 33 मेगावाट की तीन यूनिटे अलगसे लगाई गई है। यह बात दीगर है कि इन्हें चलाया नहीं जाता है। जब ग्रिड फेल होता है तब संजीवनी के रूप में जल विद्युत निगम के तहत स्थापित पिपरी और ओबरा इकाईयों से उत्पादन लिया जाता है। रिहन्द और सिंगरौली में तैयार हुई बिजली उत्तरी क्षेत्र के ग्रिड पर जाती है जिससे दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब चंडीगढ़, जम्मू व कश्मीर और उत्तर प्रदेश के तमाम इलाके रोशन होते हैं जबकि विंध्याचल पावर प्रोजेक्ट की बिजली पश्चिमी क्षेत्र के ग्रिड पर जाती है जिससे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, गोवा और दमनद्वीप रोशन होते हैं। देश के अन्य राज्यों को बिजली प्रदान करने वाले सोनभद्र के लोग अब इन आंकड़ों को लेकर राज्य और केन्द्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। अपने लिए बिजली की यह लड़ाई सिर्फ गांवों और शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि तमाम पेशेवर लोगों ने भी इस लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्स लेना शुरू कर दिया है। बीते दिनों अधिवक्ताओं ने धरना-प्रदर्शन करके अपने गुस्से का इजहार कराया था तो अलग सोनांचल राज्य की मांग कर रहे लोगों के एजेंडे का भी यही मुख्य बिन्दु है। इतना ही नहीं, ऑल सोनांचल स्टूडेंट यूनियन के अगुवा रोशन लाल यादव इस लड़ाई को रोज-ब-रोज किसी न किसी लड़ाई के रूप में लड़ते दिखते हैं। किसानों ने भी अपनी जमीन पर खड़े तार विहीन खंभों को अब जर्मीदोज करना शुरू कर दिया है। किसानों का गुस्सा जिंदगी को रोशन करने के लिए बिजली से ज्यादा महत्व तो खेती के लिए बिजली को लेकर है। जिस तरह इन दिनों इस लड़ाई में लोगों की शिरकत और हिस्सेदारी बढ़ रही है उससे साफ है कि अगर समय रहते चेता नहीं गया तो नक्सली इस लड़ाई का बेजा इस्तेमाल करने से नहीं चूकेंगे। इतना ही नहीं, सड़कों पर फूट रहा गुस्सा सरकार और अधिकारियों पर भी फूटने में देर नहीं लगने वाली है।

- साथ में सुनील तिवारी

(नई दुनिया, 23 अगस्त 2009 )

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