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इंसानी जिन्दगियों के लिए खतरा बने जिले के बिजली घर

  • सोनभद्र-सिंगरौली पट्टी में रहने वाले लोगों के खून में पारे की मात्रा सामान्य से अधिक
  • संयुक्त राष्ट्र संघ ने पर्यावरण कार्यक्रम से सम्बंधित रिपोर्ट में जताई चिंता
 

ओबरा (सोनभद्र): जनपद के ताप विद्युत गृह इंसानी जिन्दगियों के लिए खतरा बन चुके हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अपने पर्यावरण कार्यक्रम से संबंधित रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा है कि भारत के सोनभद्र-सिंगरौली पट्टी में रहने वाले लोगों के खून में पारे की मात्रा सामान्य से काफी अधिक हो गयी है जिससे नागरिकों के स्नायुतंत्र, दिमाग, गुर्दे व अन्य अंगों को स्थाई तौर पर क्षतिग्रस्त होने का खतरा है। राष्ट्र संघ ने अपनी रिपोर्ट में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के इस आंकलन का भी उल्लेख किया है जिसमे तापीय परियोजनाओं से होने वाले मरकरी के कुल उत्सर्जन की 17 प्रतिशत मात्रा के लिए अकेले इस क्षेत्र में अवस्थित बिजलीघरों को जिम्मेदार ठहराया गया है। ब्लैक स्मिथ इंस्टिट्यूट ने राष्ट्र संघ की आपत्तियों को वाजिब बताते हुए कहा है कि सन 1840 में जब सिंगरौली क्षेत्र में कोयले की खोज हुई थी तबसे लेकर आज तक इस इलाके में प्राकृतिक संसाधनों का अनवरत दोहन किया गया परन्तु पर्यावरण को सुरक्षित रखने के उपाए नहीं किये गए। बाँध, बिजली घर व कोल माइंस की सघनता ने पर्यावरणीय तंत्र को इस कदर छिन्न-भिन्न कर दिया है कि न सिर्फ भूगर्भीय जल व रिहंद जलाशय ही प्रदूषित हुआ है अपितु मरकरी, क्लोरीन व क्रोमियम के अलावा अन्य धातुयें यहाँ की मृदा व उपजो में घुल गयी। ताप विद्युत गृह प्रति वर्ष अत्यधिक मात्रा में उड़न राख का उत्सर्जन कर रहे है जिससे भूमि की उर्वरता तो खत्म हो ही रही है इस राख में मौजूद कैल्शियम, सल्फेट, सिलिकॉन, व पोटेशियम के सूक्ष्म कणों व लेड, आर्सेनिक, कैडमियम आदि टॉक्सिक तत्वों की वजह से जन स्यास्थ्य पर भी खतरनाक असर पड़ रहा है। श्वसन तंत्र के विभिन्न रोगों के अलावा फेफडों के कैंसर व सिलिकोसिस के रूप में इसका असर धीमे-धीमे सामने आ रहा है। वहीँ यह भयावह प्रदूषण भविष्य में अम्लीय वर्षा की वजह बन सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने सोनभद्र-सिंगरौली पट्टी में स्थापित लगभग 10,000 मेगावाट क्षमता के बिजलीघरो से होने वाले प्रदूषण पर गहरी चिंता जताई है। ज्ञात हो कि अमेरिका के ब्लैक स्मिथ इंस्टिट्यूट ने इस क्षेत्र को विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित सूची में शुमार कर अपनी रिपोर्ट प्रेषित  की थी। ब्लैक स्मिथ इंस्टिट्यूट का कहना है की क्षेत्र में विश्व में होने वाले कुल कार्बन डाई आक्साइड प्रदूषण की 0.3 प्रतिशत मात्रा उत्सर्जित हो रही है। वहीं भारत में कार्बन  डाई आक्साइड से होने वाले प्रदूषण में 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी अकेले इस क्षेत्र की है। ऐसे में यह इलाका ग्लोबल वार्मिंग की एक बड़ी वजह बनने जा रहा है। कुल मिला कर जनपद के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है।

बढ़ते तापमान के लिए प्रदूषण जिम्मेदार

ओबरा (सोनभद्र): ब्लैक स्मिथ इंस्टीट्यूट क्षेत्र में अनवरत बढ़ते जा रहे तापमान की वजह तापीय परियोजनाओं व खनन से होने वाले प्रदूषण को मानता है। इंस्टीट्यूट का कहना है की इस इलाके का लगभग 1,400 वर्ग मील क्षेत्र प्रदूषण की चपेट में है। प्रदूषण की चपेट में आने वाली आबादी लगभग एक लाख 85 हजार है। ज्ञातव्य है की भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी इसे प्रदूषित क्षेत्र मानते हुए यहाँ पर प्रदूषण मानीटरिंग का काम शुरू किया है।

प्रति वर्ष हो रहा 720 किलो पारे का उत्सर्जन

ओबरा (सोनभद्र): यूनाइटेड  नेशन्स एनवायरमेन्ट प्रोग्राम की रिपोर्ट दिल दहला देने वाली है। फ़्रांसीसी कंपनी द्वारा किये गए अध्ययन में कहा गया है कि सोनभद्र-सिंगरौली पट्टी में अवस्थित बिजली घर प्रति वर्ष 720 किग्रा पारे का उत्सर्जन कर रहे है। रिपोर्ट में वर्ष 1997 में विश्व बैंक से आदिवासियों के द्वारा की गयी शिकायत का उल्लेख किया गया है जिसमे तापीय परियोजनाओ के निर्माण के द्वारा पर्यावरणीय चिंताओं  को पूरा न करने की बात कही गई है।

(दैनिक जागरण, 5 अप्रैल 2009 )

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