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समाचार पत्रों से
जंगल में गाँधी
 

यह विचित्र संयोग है कि हिंडाल्कों के ठीक बगल में गाँधी की कल्पना का भारत भी मौजूद है। ग्योरपुर के गांव में विशाल टर्बाइनों के शोर के बीच गांधी का चरखा भी घूमता मिल जाएगा। वैश्वीकरण के इस दौर में भी वनवासी सेवा आश्रम ने गांधी दर्शन की जो मशाल जला रखी है, उसकी रोशनी सिर्फ देश में नहीं सरहद पार तक पहुंच रही है। जर्मन लेखिका एलिजाबेथ हांडी ने आश्रम पर लिखी पुस्तक में टिप्पणी की कि गांधी ने ऐसे भी भारत की कल्पना की होगी जहां एक ग्रामीण भी स्वावलंबन, शिक्षा, कृषि व सहकारिता का पाठ पढ़ सके । आश्रम उसका नायाब उदाहरण है। प्रख्यात पर्यावरणविद् वीडी अग्रवाल जैसे लोग इस आश्रम में प्रतिवर्ष आकर इसे संवारने में अपनी भूमिका अदा करते हैं।

गोविंद वल्लभ पंत द्वारा स्थापित इस आश्रम की बागडोर जब प्रेम भाई आद्येर उनकी धर्मपत्नी डाँ रागिनी बहन से संभाली तो आदिवासी बहुल इस क्षेत्र की दशा दयनीय थी। यहां के लोग जंगली फलों व घास-फूस जैसे गेठी, कंदा, अमलौला, पियार, चकवड़, इत्यादि खाकर जीवनयापन करने पर मजबूर थे। लकड़ी बेचना व तेंदू पत्ता तोडद्यना ही इनका मुख्य व्यवसाय था।  इन्हीं परिस्थितियों ने इस दंपति को मानव सेवा के लिए प्रेरित किया। कृषि वैज्ञानिक प्रेम भाई व चिकित्सक रागिनी बहन ने गांधी दर्शन के सिध्दांत के साथ इस परिवेश की तस्वीर को बदलने का बीड़ा उठाया। काफी हद तक उनको सफलता भी मिली। देहरादून आईएएस प्रशिक्षण एकाडमी से प्रशिक्षुओं को एक ''गाँधी का गाँव'' दिखाने के लिए यहाँ नियमित तौर पर भेजा जाता है। प्रशिक्षु प्रतिमा वर्मा, राधा मिश्रा व एलएम मीणा ने आश्रम में भ्रमण के दौरान अपने अनुभव को बांटने हुए कहा कि उन लोगों ने किताबों में गांव की जिस तस्वीर का रेखांकन देखा था, वह आश्रम के गांव में साकार रूप ले रही है।

ब्रिटेन निवासी झान्ना के अनुसार अमर्त्थ सेन की विकास की अवधारणा आश्रम में फलीभूत हो रही है। चोपन ब्लॉक के कोटा ग्राम निवासी व स्वतंत्रता संग्रामसेनानी रामनरेश तिवारी के अनुसार गांधी का सत्याग्रह व स्वावलंबन क्या था, इसे उन्होंने आश्रम से ही सीखा।

आश्रम में आदिवासी बच्चों के लिए औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा  की भी व्यवस्था है। आश्रम की आदिवासी बालिका हीर कुंवर ने जब फ्रांस में आयोजित जिमनास्टिक प्रतियोगिता में भाग लेकर रजतपदक प्राप्त किया तो जिला प्रशासन ने कहा कि इस बालिका ने सोनभद्र का मस्तक ऊँचा किया है। उसे गणतंत्र दिवस के अवसर पर सम्मानित भी किया गया।

केन्द्र सरकार ने आदिवासियों को वन भूमि पर अधिकार दिए जाने का कानून देश भर में लागू किया, लेकिन वनवासी सेवा आश्रम के संयोजक दिवंगत प्रेमभाई ने तीन दशक पहले ही यह कार्य कर दिखाया था। वह बात दीगर है कि उन्होंने सिर्फ सोनभद्र के आदिवासियों के लिए लड़ाई लड़ी थी, जिसका लाभ आदिवासियों को मिला। आज लागू वनाधिकार कानून की भी वही अवधारणा है।

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