| इस पृष्ठ को प्रिंट करें
English Web Site
मुख्यपृष्ठ हमारे बारे में कार्यक्रम प्रकाशन सोनभद्र को जानें

 

 
समाचार पत्रों से

खनन क्षेत्र में हो रहा प्रदूषण दे रहा पारिस्थितिक संकट को जन्म
नियंत्रण नहीं हुआ तो नेस्तनाबूद हो सकते हैं इर्द - गिर्द के कस्बे

 

ओबरा (सोनभद्र), निज प्रतिनिधि: असंतुलित औद्योगीकरण से अभिशापित खनन क्षेत्र से हो रहा पर्यावरणीय प्रदुषण पारिस्थितिक संकट को जन्म दे रहा है। जंगल, जमीन और जन को होने वाली क्षति दिनों - दिन इस कदर बढ़ती जा रही है कि आने वाले दिनों में वाराणसी - शक्तिनगर मार्ग के इर्द - गिर्द बसे छोटे - बड़े कस्बे, गाँव व टोले पूरी तरह से नेस्तनाबूद हो सकते हैं।
ज्ञातव्य है कि यहाँ के बिल्ली - मारकुण्डी खनन क्षेत्र में लगभग 20 क्रशर्स है जिनमे से लगभग 25 प्रतिशत क्रशर्स ही  प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड उ. प्र. से अनापत्ति हासिल कर पाये हैं। शेष क्रशरों को तमाम पर्यावरणीय नियमो की धज्जियाँ उडाते हुए दिन - रात चलाया जा रहा है।  सूत्र बताते है कि जिन क्रशरों को अनापत्ति प्रमाण पत्र हुआ भी है उनके द्वारा भी प्रदुषण नियंत्रण के उपायों को कारगर ढंग से अंजाम नहीं दिया जा रहा है।

हालात इस कदर खराब है कि सिर्फ खनन क्षेत्र में ही नहीं बल्कि आसपास के रिहायशी इलाकों में भी दिन - रात धुंध छाई रहती है। प्रदेश ही नहीं देश के असंगठित क्षेत्र के इस सबसे बड़े उद्यम में कार्य करने वाले लगभग 50 हज़ार मजदूर विभिन्न रोगों के शिकार हो रहे है। जनपद का दक्षिणांचल जो किसी वक्त देश के सर्वाधिक हरे - भरे क्षेत्रों में से एक था आज देश के सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्रों में शुमार होने के कगार पर है। क्रशरों से निकलने वाली राख ने इस पूरे क्षेत्र के पर्यावरणीय तंत्र को छिन्न - भिन्न कर दिया है।

ताजमहल पर पड़ रहे प्रदूषण के प्रभाव को लेकर काफी हो -हल्ला मचाने वाला प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उत्तर प्रदेश जंगल, जमीन व पहाड़ के अस्तित्व के साथ हो रहे खिलवाड़ पर चुप्पी साधे क्यों बैठा है, यह चर्चा का विषय है। वहीं दूसरी तरफ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में जो तथ्य प्रस्तुत किये है वो दिल को दहला देने वाले हैं।  केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने विस्तृत वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद बिल्ली - मारकुण्डी खनन क्षेत्र में एस. पी. एस. अर्थात निलंबित सूक्ष्म कणों की मात्रा 169 से 2757 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर मापी है। जबकि आर. एस. पी. एम. की मात्रा 95 से 660 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है। गौरतलब है कि एस. पी. एम. व आर. एस. पी. एम. का हवा में मानक स्तर क्रमशः 200 व 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर निर्धारित है। वहीँ खनन क्षेत्र में सल्फर डाई आक्साइड की मात्रा 5 से 31 व नाइट्रोजन आक्साइड की मात्रा 14 से 48 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है।

पर्यावरणीय प्रदूषण का अपार बोझ ढो रहे खनन क्षेत्र की यह नियति है कि न तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और न ही वन विभाग से पर्यावरणीय मानकों को स्थापित करने के कभी किसी प्रकार का सहयोग मिला। जब कभी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हरकत में आता है क्रशरों के इर्द-गिर्द पाइप लाइन बिछाकर उड़ती भस्सी पर पानी गिराने का काम शुरू हो जाता है, लेकिन कुछ समय बाद सब ठप्प हो जाता है।

जमीन के लिए बेहद खतरनाक माने जाने वाले भस्सी जिसको उद्यमी मुफ्त में बेचना चाहते है वन विभाग उसकी बिना परमिट के परिवहन कि इजाजत नहीं देता। नतीजा यह है कि ये भस्सी ओवरा, डाला व उसके इर्द - गिर्द कि सैकड़ो हेक्टेयर जमीन को लील चुकी है।

एक उद्यमी कहते है कि लालफीताशाही के चंगुल में यह उद्यम कराह रहा है। अगर हमारा सहयोग किया जाये व परयावणीय जागरूकता को आन्दोलन का रूप दिया जाय तो स्थिति निश्चित तौर पर बदलेगी।

(दैनिक जागरण, 19 मार्च 2009 )

<<< पिछला समाचार | समाचार पत्रों से मुख्य पृष्ठ | अगला समाचार >>>