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समाचार पत्रों से
नेहरू के सपने पर फिरा रिहन्द का जहरीला पानी
 

रिहन्द बांध (रेनुकूट) 30 दिसम्बर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का सपना अब यहां टूटता नजर आ रहा है। रिहन्द्र बांध का उद्धाटन करते हुए जवाहर लाल नेहरू ने कहा था ''यह क्षेत्र भारत का स्विटजरलैड बनेगा''। विंध्य क्षेत्र के ऊर्जाचल के नाम से मशहूर यह इलाका। स्विटजरलैंड तो बना नहीं बदहाली का शिकार जरूर हो गया। इस क्षेत्र के लाखों लोग प्रदूषित हो रहे हवा और पानी का शिकार हो गए।

करीब 70 वर्ग मील में फैले गोविन्द बल्लभ पंत सागर का पानी इस कदर जहरीला हो रहा है कि अब यहां पर आंध्र प्रदेश से मंगा कर मछली खाई जा रही है। हवा में खतरनाक रासायनिक तत्वों की मात्रा बढ़ती जा रही है। नतीजतन जंगल से लाख के जरिए अपनी जीविका चलाने वाले आदिवासी बदहाल हो चुके हैं तो दूसरी तरफ फ्लोराइड की वजह से कई गांवों में लोगों के हाथ-पांव टेढ़े हो चुके हैं। बिजली बनाने वाले बड़े कारखानों की फ्लाई ऐश आने वाले समय में परिस्थिति का संतुलन बिगाड़ सकती है पर यहां के कलेक्टर हीरामणि सिंह यादव इस सबसे अंजान है। यादव ने कहा प्रदूषण के बारे में हमारे यहां एक विभाग है जो जानकारी रखता है फिलहाल मेरी जानकारी में कुछ खास नहीं है। पंडित नेहरू ने करीब पांच दशक पहले इस क्षेत्र में आकर ऊर्जा क्षेत्र के लिए बड़ा सपना देखा था। इसी के चलते रिहन्द बांध का निर्माण हुआ और इस बांध के लिए सीमेंट की फैक्ट्री भी स्थापित की गई। बांध से जो बिजली बनेगी, उसकीखपत के लिए नेहरू ने बिड़ला घराने को यहां आमंत्रित किया। बिड़ला समूह ने यहां हिंडाल्को की स्थापना की जिसे बहुत ही कम दरों पर बिजली दी गई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पौने दो पैसे प्रति यूनिट बिजली इस घराने को देने और सरकारी सीमेंट फैक्ट्री को बाजार दर पर बिजली मुहैया कराने के विरोध में आंदोलन भी किया था। पर अब डाला, चुर्क, चुनार जैसी सरकारी सीमेंट फैक्ट्रियाँ निजी हाथों में जा चुकी है तो दूसरी तरफ निजी क्षेत्र मुनाफे की आंधी दौर में क्षेत्र के पर्यावरण के साथ बुरी तरह खिलवाड़ कर रहा है।

इस क्षेत्र में 1954 में स्थापित वनवासी सेवा आश्रम शिक्षा, स्वास्थ्य, कुटीर उद्योग, पशुपालन के साथ पर्यावरण को लेकर भी काम कर रहा है। आश्रम को सर्वेसर्वा रागिनी बहन ने जनसत्ता से कहा, ''कइ साल पहले ही हमने प्रदूषण्ा को जांच पड़ताल के लिए एक प्रयोगशाला बनाई थी। इस प्रयोगशाला में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सौजन्य से एक अध्ययन भी हुआ जिससे पता भी चला कि गोविन्द बल्लभ पंत सागर का पानी बिजली कारखानों को फ्लाई ऐश के चलते बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है। बड़ी-बड़ी कम्पनियां फ्लाई ऐश को सीधे पानी में बहा रही है। इनके लिए जो फ्लाई ऐश पौड (गङ्ढे) बनाए, वे बांध के जलाशय के काफी करीब है। इससे पर्यावरण के प्रति लोगों की नियत भी साफ हो जाती है। काफी समय से तो आसपास के जंगलों में फ्लाई ऐश फैका जाने लगा है।

इस क्षेत्र में जो बड़े कारखाने हैं, उनमें रेनु सागर पावर कम्पनी हिंडाल्को, एल्युमीनियम, एनटीपीसी की तीन इकाईयां शक्तिनगर, रिहन्द नगर और विंध्य नगर शामिल है। इसके अलावा कनौड़िया, कैमिक्ल्स अपने उत्पादों के अलावा निली उपयोग के लिए तापीय विद्युत का उत्पादन करता है। ये कारखाने इस क्षेत्र का पर्यावरण बिगाड़ने में पूरा योगदान दे रहे हैं। इनके अलावा तीन बड़ी कंपनियां एस्सार, रिलांयस और लैको अपना योगदान देने का इंतजार कर रही है। एनटीपीसी के डिप्टी मैंनेजर जनसंपर्क राहुल घोष ने कहा हम लोग पर्यावरण का जितना ख्याल रखते हैं, निजी क्षेत्र नहीं रख सकता। हमने 13 लाख पेड़ इस क्षेत्र में लगाए है। अनपरा में पत्रकार शहरयार खान ने कहा पूरे क्षेत्र के पर्यावरण को बिगाड़ने में कोई पीछे नहीं है। लैंको पावर प्रोजेक्ट के वाइस प्रेसिडेंट कंस्ट्रक्शन वी.के. रस्तोगी तो साफ कहते हैं कि हमें बहनजी का आशीर्वाद हासिल हैं। सरकारी संरक्षण हो तो फिर किस चीज का डर।

इस क्षेत्र में रिहंद बांध बनने के बाद से ही विस्थापन से लेकर स्वास्यि व प्रदूष्ज्ञण का मुद्दा उठता रहा है। पर खनन क्षेत्र से उगाही करने में हर वर्ग जुटा हुआ है। राजनीतिक पर्यावरण की कीमत पर वसूली कर रहे हैं तो पुलिस प्रशासन खनन से लेकर कोयले तक में अपना हाथ काला किए हुए है। मीडिया की भूमिका भी सवाली में हैं। जिले के पत्रकारों को छोड़ दीजिए, लखनऊ और दिल्ली के नामचीन खबरनवीसों के भी खनन के पट्टे है। इन पट्टों से हर महीने दो लाख से लेकर तीन लाख की आमदनी होती है। यही वजह है कि सोनभद्र में खनन विभाग के सामने खबरनवीसों की ज्यादा भीड़ होती है।

सोनभद्र से जनसत्ता संवाददाता के मुताबिक बढ़ते प्रदूषण के चलते म्योरपुर ओर चोपन ब्लॉक के दो दर्जन गांवों में महामारी की स्थिति है। रोहनिया डामर और पढ़नरवा गांव में बच्चे से लेकर बूढ़े तक फ्लोराइड के चलते विकलांग हो चुके हैं। किसी के हाथ-पैर टेढ़े है तो किसी की गर्दन। डाला, बिल्ली, चोपन और ओबरा के दो सौ क्रेशर प्लांट के चलते लोग सांस की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। डाक्टर अरविन्द सिंह ने कहा-पिछले दस सालों में इस क्षेत्र में वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण की वजह से लोग सांस से लेकर पेट तक की बीमारियों के शिकार होते हा रहे हैं। गोविन्द बल्लभ पंत सागर का पानी पीने लायक नहीं है लेकिन लोगों के सामने उसके अलावा कोई दूसरा चाराभी नहीं है। जरूरत है कि इस बड़े जलाशय में बिजली कारखानों को फ्लाई ऐश और कैमिकल कारखानों के घातक रसायनों का उत्सर्जन फौरन रोका जाए।

(जनसत्ता, 31 दिसम्बर 2009 )

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