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कर्मयोगी प्रेमभाई

 
 
  प्रेमभाई एक सभा को संबोधित करते हुए

प्रेमभाई एक गांधी विचारनिष्ठ, योजनाकार, अर्थशास्त्री, प्रभावी वक्ता, ग्राम निर्माण के प्रसिध्द तकनीशियन तथा सामाजिक दृष्टि से उपेक्षित व पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले रचनात्मक कार्यकर्ता थे, जिनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने समाज विशेषत: ग्रामीण समुदाय की समस्याओं को हल करने के लिए गांधी विचार के अनुरूप ऐसी समाज रचना की कोशिश की, जो जन सहभागिता, स्वशासन तथा दीर्घकालिक स्वाश्रयिता पर आधारित थी। प्रेमभाई ने समाज के पुर्ननिर्माण के लिए सशक्त जनान्दोलन, स्थानीय स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं के नेतृत्व विकास, ग्राम स्वराज्य संगठनों के निर्माण तथा स्थानीय संसाधनों के उचित उपयोग के लिए योजनाबध्द तरीके से जो उपलब्धियां गत 27 वर्षों में प्राप्त कीं, वे बहुत ही प्रेरणादायी हैं।

प्रेमभाई को एक गांधीनिष्ठ कार्यकर्ता बनने की प्रेरणा उस समय मिली, जब उन्होंने 18 वर्ष की आयु में मेरठ कालेज में सर्वोदय नेता श्री जयप्रकाश नारायण का प्रेरक भाषण सुना। उसके फलस्वरूप वे अपना घर छोड़कर सर्वोदय आन्दोलन के कर्मठ मनीषी श्री धीरेन्द्र मजुमदार के पास बिहार राज्य के मुंगेर जिले में स्थित खादीग्राम उद्योग में शामिल हुए, जहां पर उन्हें सादगी, आत्मसंयम तथा उत्पादक श्रम के महत्व को सीखने का अवसर मिला। अपनी मां के बहुत आग्रह पर उन्होंने 1955 में पढ़ाई पुन: प्रारंभ की और उसी वर्ष बी.एस.सी. तथा 1957 में समाजशास्त्र में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने पढ़ाई के दौरान अपना रहन, पोशक (हाफ पैन्ट, बुशर्ट) तथा आचरण खादी ग्राम की संस्कृति के अनुरूप ही रखा। एम.ए. की डिग्री प्राप्त करने के बाद वे पुन: भूदान-ग्रामदान आंदोलन के कार्यों में जुट गए। उन्होंने दो वर्ष तक गांवों की परिस्थिति तथा समस्याओं को समझा और सर्वोदय आंदोलन के प्रसिध्द गांधीवादी अर्थशास्त्री श्री अण्णा साहब सहस्रबुध्दे के साथ उनके कोरापंट प्रयोग का अध्ययन किया और उन्हींके मार्गदर्शन में 1961 में सेवाग्राम (महाराष्ट्र) में कार्य करना प्रारंभ किया। वहां उन्होंने 'इण्डो इजरायल कृषि परियोजना' से जुड़कर एक इजरायली दंपत्ति के साथ 5 एकड़ भूमि में कृषि आधारित स्वावलंबन हेतु उपयुक्त कृषि उपकरण, फसलचक्र, उन्नत कृषि विधि और तकनीकी विकास के विविध प्रयोग किए। 'घोड़े से खेती' इस प्रयोग मं उनकी एक गहरी सोच थी और उसपर विशेष जोर था। इन प्रयोगों से उन्हें काफी सीखने को मिला तथा कृषि विकास के बारे में एक वैज्ञानिक दृष्टि मिली। श्री अण्णा साहब के सानिध्य में उन्हें एक व्यापक, सामाजिक-आर्थिक संदर्भ में ग्राम स्वराज्य के मानक पर दूरगामी विकास की कार्ययोजना बनाने तथा उसके प्रभावी क्रियान्वन की दक्षता मिली।

श्री प्रेमभाई का जन्म 10 सितम्बर 1945 ई. में मेरठ नगर में हुआ। उनके पिता श्री वेद प्रकाश 'वेदालंकार' लाहौर गंगा सेवा ट्रस्ट की एक शाखा के संचालक थे। उनका हृदय गति रुक जाने के से अल्पायु में ही दिल्ली में देहावसान हो गया। प्रेमभाई का पालन-पोषण माता श्रीमती पुष्पावती ने बहुत कठिन परिश्रम के साथ किया, जिन्होंने अपने विवाह के बाद मैट्रिक से लेकर स्नातकोत्तर तक की शिक्षा प्राप्त की और फिर उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य का पद संभाला। नाना आर्य समाज व स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे। उनकी मौसी जी भी कस्तूरबा ट्रस्ट, समौली (उ.प्र.) में कार्यरत थीं। श्री प्रेमभाई को समाज सेवा की दीक्षा और संघर्षमय जीवन के संस्कार अपने परिवार से सहज विरासत में मिले।

1963 के बाद प्रेमभाई ने कुछ समय अपने कृषि तथा गोपालन के प्रयोग वाराणसी स्थित बसंत कालेज में किए। वाराणसी में ही सर्वोदय आंदोलन का संयोजन करनेवाली संस्था सर्व सेवा संघ के साथ सहमंत्री के रूप में जुड़े और तत्कालीन मंत्री श्री राधाकृष्ण जी के साथ उन्होंने देश में चल रहे ग्रामदान नव-निर्माण के प्रयोगों को आगे बढ़ाया।

1966 में बिहार तथा उसके उ.प्र. के समीपवर्ती क्षेत्र विशेषत: मीरजापुर का दक्षिणांचल भयंकर अकाल से प्रभावित था। वहां बनवासी सेवा आश्रम, उ.प्र. सूखा राहत समिति के सहयोग से नि:शुल्क भोजनालय बड़ी संख्या में चला रहा था। प्रेमभाई वहीं राहत कार्य में जुट गए। उन्होंने अकाल के स्थाई निवारण की दिशा में प्रयोग करने का विचार बनाया तथा मीरजापुर जिले का दक्षिणांचल (जिसे अब सोनभद्र जिला कहा जाता है), को आने कार्य क्षेत्र के रूप में चयनित किया। इस कार्य क्षेत्र में कार्य करने का डा. रागिणी प्रेम ने भी निर्णय लिया। डा. रागिणी के साथ प्रेमभाई का विवाह 10 जुलाई 1966 में हुआ। उनके पिता श्री विष्णु पलशीकर का परिवार भी गांधी विचार के लिए एक समर्पित परिवार है। डा. रागिणी बहन ने चिकित्सा विज्ञान में एम.डी. की डिग्री प्राप्त की है और उस्मानिया विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है। विवाहोपरान्त वे एक छाया की भांति उद्दात विचारधारा और दृष्टिकोण्ा के साथ प्रेमभाई के विभिन्न प्रयोगों में तादाम्य हो गईं। उनकी स्वास्थ्य परियोजना सोनभद्र के लिए वरदान स्वरूप हैं। उनके स्वास्थ्य प्रयोग देश के लिए मार्गदर्शक बनते जा रहे हैं।

यहां पर यह उल्लेखनीय है कि मीरजापुर का दक्षिणांचल हमेशा से अकाल और सूखा पीड़ित रहा है। अकाल निवारण के स्थाई हल ढूंढने की दृष्टि से उ.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित गोविन्द बल्लभ पंत की प्रेरणा से सन 1954 ई. में बनवासी सेवा आश्रम की स्थापना हुई थी और सूखे व अकाल के विरुध्द कार्य करने की तैयारी की गई थी। परंतु योजना क्रियान्वन की गति चुनौतियों का मुकाबला करने में धीमी रही। इस चुनौती को श्री प्रेमभाई ने स्वीकारा तथा 1967 से बनवासी सेवा आश्रम के तहत अकाल निवारण का कार्य नए तरीके से शुरू किया।

प्रेमभाई को सुप्रीमकोर्ट की ओर से 1984-85 में कालीन उद्योग में कार्यरत बाल श्रमिकों की कार्य परिस्थिति की जांच पड़ताल के लिए कमिश्नर नियुक्त किया गया। उनकी रिपोर्ट से हजारों बाल श्रमिकों को खरीद-फरोख्त से बचाया गया तथा उनकी योजना से उन सबका पुर्नवास कराया गया। इसी प्रकार से हजारों बंधुवा मजदूरों को बंधुवा मजदूरी के शिकंजे से छुड़वाने और उन्हें पुर्नवास दिलवाने का अभूतपूर्व प्रयास हुआ। उन्होंने ग्रामीण जनों के अधिकारों की प्राप्ति के लिए देश में 'ग्रामीण हकदारी एवं कानूनी सहायता' (रूरल एन्टाटिलमेंट एण्ड लीगल सपोर्ट) शुरू की। ग्रामीण समुदाय अपने विकास के लिए कानून द्वारा प्रदत्त प्राविधानों का भरपूर उपयोग कर सके, इस हेतु सामाजिक कार्यकर्ताओं, विधिवेत्ताओं, न्यायाधिपतियों का मिलकर कार्य करना आवश्यक है, इस सोच के आधार पर श्री प्रेमभाई ने उक्त परियोजना का संचालन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा आदि प्रदेशों में किया। इस परियोजना के अंर्तगत सोनभद्र जिले के आदिवासी क्षेत्र में भूमि की समस्या को लेकर एक जन आंदोलन चला, जिसके फलस्वरूप उच्चतम न्यायालय ने एक उच्चाधिकार प्राप्त आयोग की स्थापना की तथा श्री प्रेमभाई को उसका कमिश्नर नियुक्त किया। कमीशन के द्वारा क्षेत्र की भूमि समस्या के निदान का कार्य शुरू हुआ।

प्रेमभाई के व्यक्तित्व की यह विशेषता रही कि वे देश के तरुणों से जुड़े रहे और उन्हें सामाजिक कार्य करने हेतु दिशा, प्रेरण और सहयोग देते रहे। आसाम, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मण्0श्निापुर और उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक ऐसे युवा समूह हैं, जिन्हें प्रेमभाई का मार्गदर्शन और सहयोग मिला। प्रेमभाई युवाओं में गांधी विचार की समझ बढ़ाने तथा उन्हें कार्य करने हेतु सक्षम बनाने के लिए सदैव चिन्तनशील रहे। गांधी जी के 125 वीं जयन्ती वर्ष में उन्होंने देश में 125 युवा समूह संगठित करने की योजना बनाई थी। इस कार्य को संपन्न करने के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री पी.एन. भगवती के सहयोग से 'गांधी मिशन' की स्थापना की थी।

श्री प्रेमभाई ने वर्ष 1971-72 में बंगलादेश से आए 5 लाख शरणार्थियों के बीच सेवा और राहत का कार्य किया। इस कार्य की विशेषता यह रही कि विभिन्न प्रकार की सेवा, गतिविधियों के संगठन एवं प्रबंधन का दायित्व बंगलादेश से आए हुए शरणार्थियों में से चुनी हुई प्रतिभाओं को दिया गया। इस पध्दति से संसाधनों का अधिकतम सदुपयोग शरणार्थियों की बेहतरी के लिए किया जा सका। जहां कहीं सूखा, बाढ़ आदि दैविक प्रकोप हुए, वहां प्रभावित लोगों की प्रेमभाई ने बहुत ही तत्परता और दक्षता के साथ सेवा की।

यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि अपनी सेवाओं के लिए जमना लाल बजाज पुरस्कार प्राप्त प्रेमभाई का संबंध राष्ट्रीय तथा अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रही ग्राम विकास, विधि, वन, साक्षरता, कृषि आदि बहुत से संगठनों जैसे इन्टरनेशनल एग्रीकल्चरल, ईकोनामिस्ट एसोसिएशन, नेशनल लिट्रेसी मिशन, नेशनल कमेटी फार एडल्ट एजूकेशन प्रोग्राम, आई.सी.ए.अर., कपार्ट, एफ्रो, सर्व सेवा संघ, उत्तर प्रदेश गांधी स्मारक निधि, प्रदेश मतदाता जागरूकता अभियान समिति, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अ.भा. कृषि गो सेवा संघ, ग्राम नियोजन केन्द्र, नेशनल कमेटी फार प्रमोशन आफ सोशल एण्ड इकोनामिक वेलफेयर आदि के साथ एक सदस्य एवं पदाधिकारी के रूप में जुड़े रहे। वे गरीबी अन्याय आदि से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय तथा अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती के साथ उठाते रहे। उन्होंने इस हेतु इजरायल, ब्रिटेन, हालैण्ड, डेनमार्क, स्वीडेन, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इन्डोनेशिया, थाइलैण्ड, मलेशिया, सिंगापुर, नेपाल, भूटान, फिलीपीन्स तथा बंगलादेश की यात्राएं कीं। उनके अनुभवों एवं ज्ञान का लाभ अनेक संगठनों को मिला। हर संगठन में हर गांव नगर क्षेत्र में प्रेमभाई के मित्र हैं और वे सब के सहयोग से मैत्री का वातावरण बनाकर रचनात्मक कार्य को पूरा करते थे।

सामाजिक कार्य में अत्यधिक व्यस्त रहते हुए भी वे अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति सदैव जागरूक रहे और उन्हें अच्छी तरह निभाया। अपनी दोनों बेटियों का उच्च शिक्षा दिलाई। बड़ी बेटी विभा डाक्टर है। उनकी छोटी बेटी आश्रम कार्य में सहायता कर रही है। उनकी पत्नी डा. रागिणी प्रेम आश्रम से प्रारंभ से ही जुड़ी हुई हैं। इस प्रकार उनका पूरा परिवार गांधी कार्य के लिए समर्पित है।

प्रेमभाई का स्वर्गवास 7 नवंबर 1994 को अचानक हो गया। आश्रम उनके द्वारा छोड़े गए कार्य को पूरा करने के लिए पूर्णत: कृतसंकल्प है।