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कृषि, औद्यानिकी तथा वानिकी

 
 
  बनवासी सेवा आश्रम के कारण दक्षिणी सोनभद्र में टमाटर जैसी फसलें अब उगाई जाने लगी हैं
 
  आम का एक हरा भरा बाग़
 
  क्षेत्र में हरियाली बढ़ने के लिए रोपे गए पौधे

आश्रम ने अपने परिसर में अन्न, सब्जियां, चारा, बागवानी तथा वानिकी के क्षेत्रों में कई सारे प्रयोग किए। सफल प्रयोगों का गांवों में प्रसार किया गया। लोगों ने प्रेमभाई द्वारा प्रतिपादित 'हर खेत के लिए पानी, हर खेत के लिए काम' के विचार को पसंद किया तथा कृषि विकास गतिविधियों में रुचि दिखाना प्रारंभ किया।

प्रारंभ में उर्वरकों के साथ खाद के प्रयोग पर जोर दिया जाता था पर बाद में उर्वरकों का उपयोग कम कर दिया गया तथा उनके स्थान पर गौमूत्र के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया।

वर्ष 2000, 2001 तथा 2002 में ग्राम निर्माण केन्द्रों के परिसरों में 15 विशेष कैम्पों का आयोजन किया गया ताकि कृषि में कम्पोस्ट, गौमूत्र तथा वर्मीकम्पोस्ट का उपयोग बढ़ाया जा सके। वर्ष 2002-2003 में कोई विशेष कैम्प आयोजित नहीं किया गया, परंतु इस विषय पर अन्य प्रशिक्षण शिविरों तथा बैठकों में सामान्य चर्चा की गई। ग्राम सखियों तथा अनुदेशिकाओं के प्रशिक्षणों में कम्पोस्ट तथा कीटनाशकों के प्रयोग पर जोर दिया गया। कम्पोस्ट के उत्पादन के तरीके को किशोरों तथा किशोरियों के कैम्पों में प्रदर्शित किया गया। आश्रम में की जा रही खेती में उर्वरकों का उपयोग कम किया गया तथा यह लगातार कम होता जा रहा है। खाद के उपयोग तथा उचित पौधों के माध्यम से 3 एकड़ भूमि का टुकड़ा उपजाऊ बनाया गया है। इसके अतिरिक्त 11 एकड़ भूमि पर 2 फसलों को उगाया गया। परिणाम प्रोत्साहक रहे हैं।

आश्रम किसानों को बीज तथा खाद उपलब्ध कराता है। पिछले कुछ वर्षों में 3,444 किसानों को इस अवसर से लाभ मिला है।

हाल में सरकार ने कृषि के बाजारीकरण के लिए चरण उठाए हैं तथा इस बारे में सरकारी विभागों तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के लोगों का क्षेत्र में आना जाना प्रारंभ हो चुका है। लेकिन आश्रम कृषि के बाजारीकरण के विरुध्द है तथा इसने ऐसे कदम उठाए हैं जिने समाज तथा विशेषज्ञ इस प्रवृत्ति के खतरों को समझें। छोटे किसानों के लिए भोजन सुरक्षा सर्वोपरि है। इसे हर एक को समझना होगा।

औद्यानिकी

आश्रम ने केला, गन्ना, नींबू, अमरूद, आम, अंगूर तथा आड़ू की पौध लगाई हैं। पथरीली भूमि पर इनके सफल रोपण से हमारा मनोबल ऊंचा हुआ है तथा यह औद्यानिकी अधिकारियों के लिए एक नया अनुभव है।

बाद में आश्रम ने फलों की पौध की एक नर्सरी प्रारंभ की। कई ग्रामीणों ने धन एकत्र किया तथा पौधें लगाईं। अब फल घरों में देखे जा सकते हैं। कुछ ग्रामीणों ने बाजार में फल बेचना भी प्रारंभ कर दिया है।

वानिकी

आश्रम ने अपने परिसर के एक कोने में 35 एकड़ भूमि पर जंगल उगाया है। यह किसानों को अभिप्रेरित कर रहा है कि वे अपने खेतों की सीमाओं पर जलौनी लकड़ी लगाएं। कई लोगों ने अपनी अनुपजाऊ भूमि पर सघन पौधरोपण किया है।

पौधरोपण के अलावा आश्रम ने किसानों को प्रेरित किया है कि वे ग्राम वन की रक्षा करें। इसमें आशातीत सफलता मिली है।

परती भूमि विकास के लिए एक नर्सरी की स्थापना की गई है। बाद में कई ग्रामवासियों को नर्सरी लगाने तथा पौध उगाने के लिए प्रशिक्षित किया गया। प्रयास किए जा रहे हैं कि ग्रामवासी फल, जलौनी लकड़ी तथा इमारती लकड़ी की पौधें लगाएं तथा अधिकतम लाभ प्राप्त करें।