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पशुपालन

 
 
  सड़क पर गायों का एक झुंड

किसी समय में सोनभद्र जिले में काफी सारी संख्या में पशु थे, परंतु दुग्ध उत्पादन कम था। पशु, विशेष रूप से बैलों को कृषि के लिए परिसम्पत्ति माना जाता था क्योंकि वे गोबर तथा मूत्र देते थे। आश्रम हरियाणा गायों को 1971 में, संकर गायों को 1984 में तथा संकर बैलों को बाद में लाया। कई लोगों ने बैंकों से ऋण लेकर पशुपालन प्रारंभ किया, परंतु शीघ्र ही यह अनुभव किया गया कि सफलता की दर काफी कम है विशेष रूप में निर्धनों के बीच तथा बैंक एवं लोगों दोनों को नुकसान हुआ।

यह अनुभव किया गया कि दुग्ध व्यवसाय के लिए खेत तथा पूंजी की आवश्यकता होती है। इस बारे में आश्रम ने ग्राम वन, चरागाह विकास एवं चारा उत्पादन के विकास के लिए एक कार्यक्रम प्रारंभ किया। गायों की नस्ल सुधारने के लिए आश्रम ने कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम की शुरुआत 1980 में की लेकिन यह सफल नहीं हो सका। बाद में आश्रम ने सांड़ों की सेवा प्रारंभ की, लेकिन यहां भी सांड़ों की देखभाल की समस्या बनी रही।

आश्रम ने पशु चिकित्सा की सुविधा प्रारंभ की है। शासकीय कर्मचारियों को आश्रम के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के लिए अनुबंधित किया गया। अब आश्रम के कर्मचारी पशु चिकित्सा सुविधा तीन स्थानों पर उपलब्ध करा रहे हैं। इन स्थानों पर स्थानीय दवाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं।

पशुपालन को और प्रोत्साहित करने के लिए ग्राम सखी, अनुदेशिकाओं तथा कृषि विकास के प्रशिक्षणार्थियों को पशुपालन तथा उपचार के लिए भी जानकारी दी जाती है। परिणामस्वरूप पशुओं के उपचार तथा टीकाकरण में काफी बढ़ोत्तरी देखी गई है।