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खादी तथा ग्रामोद्योग

 
 
  खादी बुनते हुए एक महिला

छोटे किसानों के लिए जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कृषि के माध्यम से संभव नहीं है तथा उन्हें आय के पूरक स्रोतों की आवश्यकता होती है। इस मामले में ग्रामोद्योगों में काफी संभावनाएं हैं।

आश्रम ने खादी तथा ग्राम विकास संबंधी गतिविधियां खादी तथा ग्रामोद्योग आयोग के सहयोग से 1979 में प्रारंभ कीं तथा इनसे स्थानीय लोगों को लघु वनोपज एकत्र करने में सहायता मिली। उन्हें न केवल आंवला, बहेड़ा, बगई, आदि, जैसी उपजों का बेहतर मूल्य मिला, बल्कि उन्हें लेखा रख रखाव में दक्षता भी प्राप्त हुई जिससे भ्रष्टाचार समाप्त हो सका। इसी समय कपड़े वह अन्य ग्राम उद्योगों का उत्पादन भी प्रारंभ हुआ।

बहुत प्रारंभ में ही आश्रम ने दो तथ्य समझ लिए थे: ग्रामोद्योग की सफलता के लिए कच्चा माल तथा उपभोक्ता निकट ही होने चाहिए तथा खादी तथा ग्रामोद्योग के उत्पाद खुले बाजार से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। आश्रम ने इसके बाद स्थानीय समुदाय से चर्चा प्रारंभ की।

काफी विचार, प्रयोगों तथा विशेषज्ञों के दिशा निर्देशन से कई सारी उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं:

  • महुआ के तेल से साबुन उत्पादन
  • उच्च क्षमता वाले बैल चालित कोल्हू से सरसों के तेल का उत्पादन
  • महाराष्ट्र में कुम्हारों का प्रशिक्षण
  • अगड़िया जाति (पारंपरिक लोहार) के लोगों के साथ हस्तक्षेप
  • जूता निर्माण को प्रोत्साहन
  • आरा मशीन की स्थापना
  • बांस के कार्य तथा बांस की खेती को बढ़ावा
  • रेशम कीट तथा कोकून उत्पादन को प्रोत्साहन
  • भेड़ से बने स्थानीय ऊन का व्यापार
  • सूती एवं रेशमी वस्त्र का उत्पादन

लेकिन इसमें तमाम सारी समस्याएं भी रही हैं। नगर से निकटता के कारण कई बुनकरों ने अपने पारंपरिक कार्य को छोड़ दिया तथा अन्य व्यवसायों से संबध्द हो गए। तेजी से बदलते हुए समय समस्याएं जारी हैं।

इस स्थिति से निपटने के लिए आश्रम खेती, पशुपालन, सिलाई, बिजली फिटिंग, डीजल पम्प मिस्त्री गीरी, आदि, जैसे रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण आयोजित कर रहा है। यह सामाजिक कार्यकर्ता, पशु चिकित्सक, चिकित्सक, आदि, तैयार करने के लिए भी प्रशिक्षण आयोजित कर रहा है।

आश्रम में अपनी बिजली फिटिंग, पम्प, पाइप, वाहनों, आदि, के रखरखाव के लिए एक कार्यशाला है। विद्यालय से कुछ विद्यार्थियों को इस कार्यशाला में प्रशिक्षण दिया जाता है।

तमाम बाधाओं के बावजूद अब तक लगभग 3,000 लोगों को विभिन्न व्यवसायों में प्रशिक्षण दिया जा चुका है। कई प्रशिक्षणार्थियों ने अपनी दुकानें, कार्यशालाएं खोली हैं तथा कई चालक, मिस्त्री आदि बन गए हैं। कई लोगों ने सिलाई सीख कर अपनी दुकानें खोजी हैं।

आश्रम में उपलब्ध प्रशिक्षण सुविधाओं का उपयोग अन्य स्वैच्छिक संगठन भी कर रहे हैं।