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ग्रामीण हकदारी तथा कानूनी सहयोग

 
 
  (ऊपर) भूमि हकदारी से सम्बंधित जारी एक बैठक, तथा (नीचे) इस कार्यक्रम की बदौलत एक महिला अपने खेत में
 

निर्धन तथा पिछड़े हुए लोगों का कानून की जानकारी के अभाव में उत्पीड़न होता है। वे अपने हितों के लिए बनाए गए प्रावधानों को भी नहीं जानते हैं तथा वे विकास की योजनाओं में पीछे रह जाते हैं। जब उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है तो समस्याएं बढ़ जाती हैं।

आश्रम ग्रामवासियों को कानूनी सहायता निश्चित अंतराल पर दे रहा है। जब आवश्यकता होती है तो किसी विशिष्ट बिन्दु पर सूचना दी जाती है और प्रशिक्षण आयोजित किया जाता है।

आश्रम का कार्यक्षेत्र भूअभिलेखों की विसंगतियों से भरा हुआ है। कई लोगों ने निर्धन किसानों की जमीनों पर कब्जा कर लिया है तथा वन एवं राजस्व विभाग अपने अपने मानचित्रों तथा इसलिए भूमि पर लड़ते रहते हैं। इस समस्या का समाधान हो सके इससे पूर्व 1980 में एक अभियान चलाया गया ताकि लोगों धारा 20 तथा 4 के अंर्तगत उनकी जमीन के टुकड़ों से हटाया जा सके।

लोग तथा आश्रम दोनों ही इस स्थिति से परेशान थे। इसी समय आश्रम ने चार मुद्दों पर विस्तृत अध्ययन करने का निर्णय लिया - भूमि की समस्या, प्राथमिक विद्यालय, राशन की दुकान तथा बंधुआ मजदूर। इससे ग्रामीण हकदारी कार्यक्रम की नींव पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में 1982 में एक याचिका दायर की गई ताकि दो मुद्दों का संबोधित किया जा सके: 1. वन अधिनियम की धारा 4 के अंर्तगत भूमि पर अधिकार, तथा 2. बंधुआ मजदूरों की स्वतंत्रता। अन्य दो के लिए राज्य स्तरीय एडवोकेसी प्रारंभ की गई। परिणामस्वरूप प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधरी। आश्रम ने 1983-84 में राशन की दुकानें चलाईं तथा दूरस्थ क्षेत्रों में भी अनाज तथा मिट्टी का तेल उपलब्ध कराया। बाद में गांव वालों ने सस्ते राशन की दुकानें स्वयं चलाना प्रारंभ किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश शासन को आदेश दिया कि वह बंधुआ मजदूरों के मुक्त कराए एवं उनका पुर्नवसन करे। आश्रम की सहायता से लगभग 1,500 बंधुआ मजदूर छुड़ाए गए।

धारा 4 पर सुनवाई 993 तक चलती रही। 1986 में सर्वोच्च न्यायालय ने भूमि हकदारी के लिए तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग के एक सदस्य प्रेमभाई स्वयं थे। न्यायलय ने ग्रामवासियों के लिए कानूनी सलाहकार, 6 अतिरिक्त जिला जज न्यायालय, 25 सहायक अभिलेख अधिकारी तथा एक अभिलेख अधिकारी नियुक्त किए।

इसमें आश्रम तथा ग्रामीणों की काफी ऊर्जा व्यय हुई। लेकिन इसका उजला पहलू यह था कि लोक अदालत प्रणाली से काफी बड़ी संख्या में मामले सुलझ गए।

वन अधिनियम की धारा 20 के अंर्तगत विवादों के कारण वन विभाग द्वारा किसानों की बेदखली को रोकने के लिए सरकार को सहायता दी गई कि वह अभिलेखों की समीक्षा करे। परिणामस्वरूप बेदखली रुकी। कुछ चुनींदा मामलों में निर्धन लोगों के लिए एडवोकेसी भी करी गई।